'पर उपदेश कुशल बहुतेरे'
हमाम में सब नंगे: टीवी की TRP पर तंज कसने वाला 'भास्कर' खुद कितना दूध का धुला है?कहते हैं कि दुनिया में सबसे सुखी वही है, जिसके पास अपनी गलती छुपाने के लिए दूसरे की बड़ी गलती मौजूद हो। हमारे 'अग्रणी' अखबार दैनिक भास्कर ने भी यही किया। पांच राज्यों के चुनाव क्या आए, चैनलों पर चिल्लाने वालों की तो लॉटरी लग गई। एंकर ऐसे चीख रहे थे जैसे परिणाम नहीं, पड़ोस के घर में लगी आग की खबर दे रहे हों। भास्कर ने मौका ताड़ा और एक कार्टून जड़ दिया- "शाबाश, थोड़ा और जोर से चिल्लाओ... तुम्हारा बीपी बढ़ेगा, तो हमारी टीआरपी चढ़ेगी।"
वाह! क्या बात है। इसे कहते हैं 'सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज को'। भास्कर बाबू टीवी वालों को आईना दिखा रहे हैं, मानो खुद गंगाजल से नहाकर प्रेस में बैठते हों।
खबरों के बीच विज्ञापन या विज्ञापन के बीच खबर?
भास्कर का यह तंज पढ़कर मुझे अपना वह दिन याद आ गया, जब मैंने सुबह-सुबह देश की ताजा स्थिति जानने के लिए अखबार उठाया था। पहले पन्ने पर एक आलीशान कार खड़ी थी, दूसरे पर 'पधारो म्हारे सेल' का बोर्ड लगा था, तीसरे पर किसी बाबा का चूर्ण बिक रहा था और चौथे पर 'जैकेट विज्ञापन' की तहें थीं।
खबर ढूंढते-ढूंढते मेरी चाय ठंडी हो गई, पर खबर नहीं मिली। अंत में पन्ना नंबर 12 के एक कोने में छोटी सी खबर मिली कि देश में महंगाई बढ़ गई है। अब बताइए, जो खुद 'खबरों के बीच विज्ञापन' नहीं, बल्कि 'विज्ञापनों के बीच खबर' परोस रहा हो, वह टीआरपी वालों को नैतिकता का पाठ पढ़ा रहा है?
टीआरपी का 'डिजिटल' भूत
चूँकि भास्कर के पास अपना टीवी चैनल नहीं है, तो उसे टीआरपी शब्द से वैसे ही चिढ़ है जैसे कुंवारे को पड़ोस की बारात से होती है। उसे लग रहा है कि ये डिजिटल वाले एग्जिट पोल के नाम पर जनता को 'उल्लू' बनाकर सारा मेवा (विज्ञापन) खुद ही डकार रहे हैं।
भास्कर जी भूल गए कि जब वह खुद 'नंबर 1' होने का दावा ठोकते हैं, तो वह भी एक तरह की 'प्रिंट टीआरपी' ही होती है। मकसद दोनों का एक ही है—सेठों की तिजोरी से पैसा निकालकर अपनी तिजोरी में भरना।
महंगाई का 'महिमामंडन'
मीडिया वाले डीजल, पेट्रोल और गैस पर ऐसे छाती पीटते हैं जैसे सगे संबंधी बिछड़ गए हों। लेकिन कभी उस 'विज्ञापनी टैक्स' पर बात नहीं करेंगे जो हर साबुन, तेल और बिस्किट के पैकेट पर उपभोक्ता से वसूला जाता है।
हीरो-हीरोइन को करोड़ों दिए- ठीक है।
शूटिंग और एड एजेंसी को अरबों दिए- बहुत बढ़िया।
अखबार और टीवी को विज्ञापन का चंदा दिया- अति सुंदर।
ये सारा पैसा क्या मीडिया वाले अपनी जेब से देते हैं? नहीं भाई, ये तो 'आम आदमी' की जेब से निकलता है। पर मीडिया इस पर चुप रहता है। आखिर 'अपने पेट पर लात' कौन मारता है?
निष्कर्ष
भास्कर का वह कार्टून दरअसल एक 'सेल्समैन' का दूसरे 'सेल्समैन' के प्रति ईर्ष्या भाव था। टीवी वाला शोर मचाकर विज्ञापन बटोर रहा है, अखबार वाला पन्ने रंगकर। जनता तो बस उस फुटबॉल की तरह है, जिसे कभी 'एग्जिट पोल' की लात पड़ती है, तो कभी 'फुल पेज एड' की।





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